‘मनरेगा पर बुलडोजर चला दिया’ — केंद्र सरकार पर सोनिया गांधी का तीखा वार
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Published By - The Global Vission News Desk
Date : 20 December 2025
सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार पर बोला तीखा हमला: मनरेगा पर गरमाई सियासत.
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर उस ऐतिहासिक योजना को कमजोर कर रही है जो लाखों गरीबों और ग्रामीण परिवारों के लिए जीवन रेखा रही है। सोनिया गांधी ने इसे महज प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि गरीबों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया.
उनके इस बयान के बाद मनरेगा एक बार फिर भारतीय राजनीति में केंद्रीय मुद्दा बन गया है. इस मुद्दे पर संसद से लेकर सड़क तक बहस तेज हो गई है, जिससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार वाकई इस योजना में सुधार कर रही है या धीरे-धीरे इसे खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
मनरेगा क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) 2005 में संसद द्वारा पारित किया गया था और 2006 से पूरे देश में लागू किया गया था। यह भारत की उन कुछ योजनाओं में से एक है जो कानून द्वारा रोजगार की गारंटी देती है।
मनरेगा की मुख्य विशेषताएं:
प्रत्येक ग्रामीण परिवार के लिए प्रति वर्ष न्यूनतम 100 दिन का रोजगार
कार्य अकुशल श्रम पर आधारित है।
काम न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता
स्थानीय स्तर पर रोजगार, पलायन में कमी
पारदर्शिता हेतु सामाजिक अंकेक्षण एवं जॉब कार्ड व्यवस्था
सामाजिक एवं आर्थिक महत्व:
मनरेगा सिर्फ एक रोजगार योजना नहीं है, बल्कि यह भी है:
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है
गरीब परिवारों के लिए न्यूनतम आय सुनिश्चित करता है
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ती है
सूखा, बाढ़ और महामारी जैसे संकटों के दौरान सुरक्षा जाल के रूप में कार्य करता है
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर COVID-19 महामारी के दौरान मनरेगा लागू नहीं होता, तो ग्रामीण भारत में स्थिति कहीं अधिक गंभीर हो सकती थी।
सोनिया गांधी ने क्या कहा? - कथन का सारांश
सोनिया गांधी ने एक वीडियो संदेश और लिखित बयान में सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला. उसने कहा:
"सरकार ने मनरेगा पर बुलडोजर चला दिया है। यह गरीबों की मेहनत और अधिकारों का अपमान है।" उनके बयान की मुख्य बातें:
सरकार ने बिना व्यापक चर्चा के मनरेगा का ढांचा बदल दिया है.
योजना की मूल भावना को कमजोर किया जा रहा है।
यह महज एक प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि गरीब विरोधी कदम है।
कांग्रेस पार्टी इस फैसले के खिलाफ हर मंच पर लड़ाई लड़ेगी.
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मनरेगा किसी एक राजनीतिक दल की उपलब्धि नहीं, बल्कि देश के करोड़ों ग्रामीण नागरिकों का अधिकार है।
विवाद की जड़ क्या है?
मनरेगा को लेकर विवाद तब और गहरा गया जब केंद्र सरकार ने इसके तहत एक नए ढांचे/मिशन की घोषणा की। सरकार का तर्क है कि वह योजना को अधिक प्रभावी, तकनीकी रूप से उन्नत और परिणामोन्मुखी बनाना चाहती है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि ये बदलाव योजना को कमजोर करने की रणनीति है.
विपक्ष के प्रमुख आरोप:
नाम और पहचान मिटाना
विपक्ष का कहना है कि मनरेगा का नाम और स्वरूप बदलना इसकी ऐतिहासिक पहचान मिटाने की कोशिश है.
कानूनी गारंटी को कमजोर करना
रोजगार की वैधानिक गारंटी को धीरे-धीरे गैर-कानूनी स्वरूप में बदला जा रहा है।
वित्तीय बोझ राज्यों पर डालना
केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी कम कर रही है और खर्च का बोझ राज्यों पर डाल रही है.
बजट में कटौती
हर साल मनरेगा के लिए आवंटित बजट वास्तविक मांग से कम रखा जाता है.
बजट, भुगतान और जमीनी हकीकत
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि मनरेगा को "केवल कागजों पर मौजूद योजना" में बदल दिया गया है।
मुख्य समस्याएँ:
वेतन भुगतान में महीनों की देरी
कई राज्यों में मांग के बावजूद काम की कमी
तकनीकी आवश्यकताओं (जैसे आधार लिंकिंग) के कारण मजदूरों का बहिष्कार
सामाजिक अंकेक्षण प्रक्रिया को कमजोर करना
ग्रामीण क्षेत्रों की रिपोर्टों से पता चलता है कि भुगतान में देरी के कारण कई मजदूर ऋण लेने के लिए मजबूर हैं।
सरकार का रुख क्या है?
केंद्र सरकार का कहना है कि:
मनरेगा को और अधिक पारदर्शी एवं प्रौद्योगिकी सक्षम बनाया जा रहा है।
फर्जी जॉब कार्ड और भ्रष्टाचार रोकने के लिए बदलाव जरूरी है।
संसाधनों का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा रहा है।
सरकार का यह भी कहना है कि विपक्ष बेवजह डर फैला रहा है और योजना को बंद करने का कोई इरादा नहीं है.
संसद और राजनीतिक माहौल
मनरेगा को लेकर संसद में जमकर हंगामा हुआ. विपक्षी सांसदों ने सरकार से अपना फैसला वापस लेने की मांग करते हुए नारे लगाए।
राजनीतिक प्रभाव:
यह मुद्दा अब सिर्फ नीतिगत मामला न रहकर राजनीतिक संघर्ष बन गया है।
सीधा असर ग्रामीण वोट बैंक पर.
2026 तक होने वाले चुनाव में अहम मुद्दा.
विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा जैसे मुद्दे ग्रामीण भारत को भावनात्मक और आर्थिक दोनों स्तरों पर प्रभावित करते हैं।
ग्रामीण भारत की आवाज़
ग्रामीण मजदूरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि:
मनरेगा को कमजोर करने से सामाजिक असमानता बढ़ सकती है.
यह योजना न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा की नींव है।
सुधार आवश्यक हैं, लेकिन अधिकारों से समझौता करने की कीमत पर नहीं।
निष्कर्ष
मनरेगा को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी के बीच टकराव सिर्फ एक योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गरीबों के अधिकार, संघीय ढांचे और सामाजिक न्याय से जुड़ा एक बड़ा सवाल है। सरकार इसे सुधार और पुनर्गठन के रूप में देखती है, जबकि कांग्रेस और विपक्ष इसे गरीब विरोधी कदम मानते हैं।
आने वाले समय में यह मुद्दा ग्रामीण राजनीति, संसदीय कार्यवाही और राष्ट्रीय विमर्श में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत से कोई संतुलित समाधान निकलता है या फिर यह मुद्दा चुनावी राजनीति में एक हथियार बनकर रह जाएगा.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. मनरेगा को लेकर क्यों है विवाद?
क्योंकि सरकार ने इसके ढांचे और स्वरूप में बदलाव किया है, जिसे विपक्ष गरीब विरोधी मानता है.
Q2. क्या है सोनिया गांधी का मुख्य आरोप?
वह कहती हैं कि सरकार मनरेगा को कमजोर कर रही है और गरीबों का हक छीन रही है.
Q3. सरकार का रुख क्या है?
सरकार का कहना है कि वह इस योजना को और अधिक प्रभावी और पारदर्शी बना रही है.
Q4. क्या मनरेगा बंद किया जा रहा है?
सरकार तो ऐसा नहीं कहती, लेकिन विपक्ष को डर है कि इसे धीरे-धीरे निष्प्रभावी किया जा रहा है.
अस्वीकरण
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